कुभलगढ़ (राजसमंद)

महाराणा कुभा द्वारा दुर्ग-स्थापत्य के प्राचीन भारतीय आदर्शों के अनुरूप बना कुंभलगढ़ गिरि दुर्ग का अच्छा उदाहरण है। मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर सादड़ी गाँव के समीप स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग संकटकाल में मेवाड़ के राजपरिवार का आश्रय स्थल रहा है।

इस दुर्ग का प्रमुख शिल्पी मण्डन था।इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने सन 1459 वार शनिवार को कराया था। इस किले को ‘अजयगढ’ कहा जाता था क्योंकि इस किले पर विजय प्राप्त करना दुष्कर कार्य था। कुंभलगढ़ दुर्ग 36 किलोमीटर लम्बे परकोटे से घिरा हुआ है जो अन्तर्राष्ट्रीय रिकार्ड में दर्ज है। इसकी सुरक्षा दीवार इतनी चौड़ी है कि एक साथ आठ घुड़सवार चल सकते है। कर्नल टॉड ने कुंभलगढ़ की तुलना सुदृढ़ प्राचीरों, बुर्जों, कँगूरों के विचारों से ‘एट्रस्कन वास्तु’ से की है

राम पोल Source : wikipedia.org

दुर्ग के भीतर झालीबाव बावड़ी, कुम्भस्वामी विष्णु मंदिर, झालीरानी का मालिया, मामादेव तालाब, उड़ना राजकुमार (पृथ्वीराज राठौड़) की छतरी आदि अन्य प्रसिद्ध स्मारक बने हुए हैं । यहीं उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ एवं राणा प्रताप का जन्म हुआ । इसके ऊपरी छोर पर राणा कुंभा का निवास है, जिसे ‘कटारगढ़’ कहते हैं। इस किले की ऊँचाई के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि यह इतनी बुलन्दी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की ओर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।

किले का स्थापत्य :

  • दुर्ग की प्राचीर 36 मील लम्बी व 7 meter ही चौड़ी है जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं, इसलिए इसे भारत की महान दीवार के नाम से जाना जाता है।
  • किले के उत्तर की तरफ का पैदल रास्ता ‘टूट्या का होड़ा’ तथा पूर्व की तरफ हाथी गुढ़ा की नाल में उतरने का रास्ता दाणीवहा’ कहलाता है।
  • किले के पश्चिम की तरफ का रास्ता ‘हीराबारी’ कहलाता है जिसमें थोड़ी ही दूर पर किले की तलहटी में महाराणा रायमल के ‘कुँवर पृथ्वीराज की छतरी’ बनी है, इसे ‘उड़वाँ राजकुमार’ के नाम से जाना जाता है । पृथ्वीराज स्मारक पर लगे लेख में पृथ्वीराज के घोड़े का नाम ‘साहण’ दिया गया है।
  • किले में घुसने के लिए आरेठपोल, हल्लापोल, हनुमानपोल तथा विजयपाल आदि दरवाजे हैं। कुम्भलगढ़ के किले के भीतर एक लघु दुर्ग कटारगढ़’ स्थित है जिसमें ‘झाली रानी का मालिया’ महल प्रमुख है।
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